Dear Friends, Here is me back.. trying to express some things and lot of nothings.... irregularly.. yet regularly!

Friday, October 31, 2008

जय आंबे

A few years ago, we had a competition on Female Foeticide... In lines of the same, we were supposed to present charts and stuff... A newspaper article spoke of ' जय आंबे ' as a new word coined to let the parent know the gender of the fetus....

Here is the mother talking to her unborn child in her womb...

"माँ" तुझसे ना सुन पाऊँगी
शुन्य लोक जाना है तुझे ।
कोख तक ही जीवन था तेरा
जन्म से पहले मोक्ष पाना है तुझे।

तू ही सरस्वती, लक्ष्मी तू मेरी
देवी का निराला रूप है तू ।
लेकिन गृह में मेरे प्रवेश
कभी ना ले पायेगी तू ।

मज़बूरी मेरी है
समाज का चलन है ।
कभी न कभी जुदा तुझसे है होना
लड़की आख़िर पराया धन है ।

तब भी में रोटी, अब भी रोउंगी
जन्म तुझे जो ना दे पाई।
जीवन देकर तेरा तिरस्कार ना करुँगी
होने दूउंगी ना मुझ जैसी फिर एक रुसवाई।

इस माँ की अब बेटी ना होगी
हो सके तो मुझे तू करना क्षमा प्रदान।
तेरे जीवन के द्वार पर कर रही हूँ तैयार
बेटी, तेरी अर्थी का सामान।


Dated: 27th November, 2004

1 comment:

Raviratlami said...

बहुत ही सुंदर भावपूर्ण कविता